Freemindscafe

बचपन!

गर्मियों की शाम थी, वीकेंड था और मैं अपने पति और दो छोटे बच्चे, अन्वेषा व अनिरुद्ध के साथ फ्लैट में टीवी देख रही थी | तब अन्वेषा लगभग डेढ़ साल की होगी अथवा अनिरुद्ध चार महीने का होगा | अन्वेषा पूरे दिन घर पर बोर हो जाने के कारण बाहर घूमने की जिद्द करने लगी | उसका मूड फ्रेश करने के लिए हमने पास ही के स्तिथ रेस्ट्रॉन्ट, मकदोनल्ड्स में जाने का प्लान किया | हमने बच्चों को तैयार किया और घर से निकल गए |

घर से बाहर निकलने पर हमें ये एहसास हुआ की गर्मी बहुत जादा है, और बच्चों को नुक्सान पंहुचा सकती है | वापस घर लौटने पर अन्वेषा शायद रोने लगती इसीलिए मेरे पति ने ये तय किया की मैं और बच्चे गाडी में ही बैठे रहेंगे और खाली मेरे पति रेस्ट्रॉन्ट जाकर खाने-पीने का सामन पैक कराकर ले आएंगे | ऐसे में बच्चों की कार में ही सैर हो जाएगी और गर्मी से बच्चे रहेंगे | बच्चों के पापा ने गाडी रेस्ट्रॉन्ट के सामने, सड़क के किनारे पार्क कर दी और वो स्नैक्स लेने चले गए | मैंअपने बच्चों के साथ गाडी में थी और रोड में आती-जाती गाड़ियों को देख रही थी |

अचानक मेरा ध्यान दूर से आते एक सात-आठ साल के बच्चे पर पड़ा | दूर से मुझे उसके एक हाथ में गुलाबी और सफ़ेद रंग के गुब्बारे दिखाई दिए और दूसरे हाथ में कुछ और था जो ठीक से दिखाई नहीं दिया |
कुछ और पास आने पर मैंने देखा की उसके दुसरे हाथ में सब्जी की एक पॉलिथीन थी जिसमे कुछ प्याज़, टमाटर और धनिया था | उसी हाथ के बगल में उसने पांच-छेह बड़ी-बड़ी लकड़ियों की फन्टियां दबा रखी थीं | वो लकड़ियां आपस में ठीक से बंधी नहीं थीं, जिसके कारण कभी कोई लकड़ी गिरती तो कभी दूसरी | वह लकड़िया उसके घर वालों ने शायद चूल्हा जलाने के लिए मंगाई होंगी | लड़का कभी लकड़ियां सम्भलता तो कभी सब्ज़ी की थैली | उसके हाथ में लगे गुब्बारे जो उसको बाकी सब चीज़ों से जादा प्रिये थे |

ये क्या ! अचनक उसके हाथ से गुब्बारों का गुच्छा निकल कर सड़क पर गिर गया और उड़ कर सड़क के बीच में पहुंच गया | उसने बिना अपनी जान की परवा किये बिना सारा सम्मान किनारे रख और दौड़ कर गुब्बारे उठा लाया | उफ्फ ! शुक्र है की दूसरी तरफ से जो गाड़ी आ रही थी उसकी गति धीमी थी नहीं तो अनर्थ हो सकता था | उस बच्चे की मदद के लिए मेरा मन बहुत था लेकिन दूध पीते बच्चों को छोड़ कर जाना ठीक नहीं था | सामान को गिराते और सँभालते वो आगे की तरफ बड़ा जा रहा था और में कुछ नहीं कर पायी |

उस बच्चे के हाथों में उन लकड़ियों से न जाने कितनी फांसे आई होंगी ? न जाने उन गुब्बारों से खेलने को उस मन कितना व्याकुल होगा ? कब वो घर पहुंचेगा,और कब वो सब्जी और लकड़ियों का बोझ अपने नाज़ुक कन्धों पर से हटाएगा और कब वो उन रंग-बिरंगे गुब्बारों को उछाल-उछाल कर खेलेगा ?

उसे इस प्रकार देखकर मेरा मन बड़ा ही विचलित हो उठा | मुझे पता नहीं क्यूँ अपने मन मैं एक ग्लानि सी हुई, शायद इसीलिए की चाहते हुए भी मैं उसकी कोई मदद नहीं कर पायी | शायद वो किसी से मदद कि कोई उम्मीद नहीं कर रहा होगा | शायद वो अपनी जिंदिगी से खुश होगा | शायद ये सब काम वो अपने मन से कर रहा होगा | पर क्या उसका बचपन रंग भरी किताबों और खिलौनों के बीच नहीं कटना चाहिए था ?